Monday, May 12, 2008

जिंदगी का सफर

ज़िंदगी अजीब सी हो गई है;
तकदीर जैसे कफ़न ओढ़ के सो गई है.
चारों तरफ़ जो है वो बस थकन और हार;
कोई टू लौटा दे मुझे, वो खुशियाँ वो प्यार……….

लोगों की भीड़ मैं अकेला पड़ गया हूँ;
हर मोड़ पे थे जो दोस्त, उन दोस्तों से बिचाद गया हूँ.
शाम से डर लगता है, रातिएँ सताती हैं;
आखें बंद करते ही पुरानी यादिएँ आती हैं……………

मायूस हूँ मैं अब तक के सफर से;
मुद कर पीछे देखूं टू हैं सिर्फ़ अँधेरा और तन्हाई.
लड़ रहा हूँ अकेला ही अपने डर अपनी किस्मत से;
लौटेंगे वो दिन, वो दोस्त, वो खुशियाँ;
जी रहा हूँ मैं इस उम्मीद मैं ………………

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