Tuesday, May 13, 2008

मीठी सी मुस्कान!

नहीं चाहिए मुझको
तेरे जीवन भर का प्यार
नहीं चाहिए मुझको
तेरे यौवन का श्रृंगार
बस॰॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए एक प्रेरणा
एक तरन्नुम
जो दे,
जीवन भर लड़ने की भूख,
गहरे दरिया में गिरकर
ऊपर उठने का ऐहसास,
आसमान में उड़कर
उड़ते रहने का आग़ाज,
आलम के सपने को
सच करने का ऐहसास।
बस॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए तेरी वो
मीठी सी मुस्कान!
मीठी सी मुस्कान!!

माँ

माँ, मुझे नजर लग गयी है किसी की...
मेरी नज़र उतार दे।
अब मुझे लगने लगा है
कि बेकार नहीं थीं तेरी वो मिर्चें जो तू जला देती थी,
मुझ पर न्योंछावर करके, जब-जब बीमार हो जाता था मैं।
अब लगता है पुराने नहीं थे तेरे वो रिवाज,
जब मेरे माथे पर काली टिपकी लगाकर,
दूर रखती थी तू मुझे बुरी नजरों से।
माँ मुझे नजर लग गयी है किसी की,
दिल्ली भर की नजरें घूरती रहती हैं, सुबह से शाम तक।
सबकी हाय है शायद, घुटा-लुटा-पिटा सा बैठ जाता हूँ हर शाम,
थक हार कर, कोई काम नहीं बन रहा आजकल।
माँ! इस बार पंडित जी के पास नहीं जायेगी पूछने,
कौन सा राहू बैठा है पकडकर....?
तू बडी आस से क्यों कहती है चहककर-
" बेटा कब ले चलेगा दिल्ली 'घुमाने' "
माँ! मर जायेगी तू देखकर कि तेरा लाड़ला,
जिसके हर नखरे को तूने हमेशा संभाला है,
बार बार गिर जाता है,
जख्मी घुटने को कोई नहीं सहलाता माँ!
यहाँ कोई नहीं उठाता माँ!
आजकल तेरे हाथ की बनी चाय नहीं,
ताजे गरम गरम आँसू पी लेता हूँ,
क्योंकि इस शहर में रोने पर मनाही है।
यहाँ हर वक्त मुस्कुराना पड़ता है माँ!
तू कैसे कर पायेगी ये फरेब खुद से ही?
पहचान लेगी तू मेरी हर मुस्कान

Monday, May 12, 2008

जिंदगी का सफर

ज़िंदगी अजीब सी हो गई है;
तकदीर जैसे कफ़न ओढ़ के सो गई है.
चारों तरफ़ जो है वो बस थकन और हार;
कोई टू लौटा दे मुझे, वो खुशियाँ वो प्यार……….

लोगों की भीड़ मैं अकेला पड़ गया हूँ;
हर मोड़ पे थे जो दोस्त, उन दोस्तों से बिचाद गया हूँ.
शाम से डर लगता है, रातिएँ सताती हैं;
आखें बंद करते ही पुरानी यादिएँ आती हैं……………

मायूस हूँ मैं अब तक के सफर से;
मुद कर पीछे देखूं टू हैं सिर्फ़ अँधेरा और तन्हाई.
लड़ रहा हूँ अकेला ही अपने डर अपनी किस्मत से;
लौटेंगे वो दिन, वो दोस्त, वो खुशियाँ;
जी रहा हूँ मैं इस उम्मीद मैं ………………

Saturday, May 10, 2008

Mulk ko sarhadon mein mat banto,

Mulk ko sarhadon mein mat banto,
Mazhab ko Firkon mein mat banto,

Milkar rehna bhi mushkil nahein,
Pyaar ko tukron mein mat banto,

Tum socho woh soch sab ki nahein,
Soch ko sochon mein mat banto,

Jism aik hai toh kyaa fark reh gaya,
Insaan ko mazhabon mein mat banto,

Kya hasil hai tum ko simt mein simatt jana,
Ik kataar ko kataaron mein mat banto,

Ishwar ko chor do, baksh do 'doshi',
Uss ko zubaano mein mat banto.

Zindagi har roz naye naye rang dikhati hai

ज़िंदगी हर रोज़ नए नए रंग दिखाती है,
आज हसती है तौ कल रुलाती है.
कभी अपनों से दूर करती है,तौ कभी परायों के करीब लाती है,
कभी तनहियों मी सुकून मिलता है,
कभी भीड़ मी अकेलापन महसूस कराती है,
ज़िंदगी हर रोज़ नए रंग दिखाती है...........


बनते है तरह तरह के रिश्ते,
कभी किसी से दुश्मनी, कभी किसी से मोह्हबत कराती है,
रिश्तों की खुशियों के लम्हों के बाद,
रिश्तों के टूटने के दर्द का एहसास कराती है,
आज हसती है तौ कल रुलाती है,
ज़िंदगी हर रोज़ नए रंग दिखाती है............


तय करता है इंसान एक मंजिल अपने लिए,
हर मंजिल के दो रस्ते ये बताती है,
मेरे साथ अक्सर यह हुआ है दोस्तों, मंजिल तक पहुच कर भी,
किस्मत मुझे नाकामी का एहसास कराती है ,
ज़िंदगी हर रोज़ नए रंग दिखाती है............
आज हसती है टू कल हसती है .....................

किया खोया किया पाया

खो के क्या खोया हमने
पा के क्या पाया हमने
आंसू को चू कर तुम्हारे
आपके दुखो को पाया हमने

तुम यहाँ हो या नही
क्या फर्क पड़ता है हमे
तेरे एहसास को चू कर
तेरे प्यार को पाया हमने

फलक की नश्वर तस्वीर बनाई
उसमे रंग भरे तुम्हारे
तुम्हारा इंतज़ार भी किया
क्या रुक कर कुछ पाया हमने?

चलना ज़िंदगी है कहते हैं आप
हम हो नही सकते तुम्हारे
फ़िर वही शोर मॅन को जगाता है
की खो के क्या खोया हमने

जिंदगी की राह पर

जिंदगी है एक नदी की धारा
चलना है लगातार
रुकना नही, थामना नही
चलते रहना मेरे साथी ,ओ यार!!

मंजिल की रहा पर
उसे पाने की चाह पर
तू कठिन परिश्रम कर
और न बढाओ से डर

मत समझ स्वयं को छोटा
कुछ भी न होता खोता
ख़ुद को समझ सबसे ऊचा
पर मत सोच दूसरो को नीचा

सोने का आराम न कर
थकने का तू काम न कर
बस जागने का है काम
क्युकी तुझे पाने है इस दुनिया मी नाम!

Friday, May 9, 2008

ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो

ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो
भीगी हुए मंज़र पर ठहरा था कोई साहिल
आज भी उस की याद में तुम बरसती क्यों हो?

अनजान सी लगती है ,साथ गुजरी हुई राहें
अठखेलियाँ वो अल्हड़पन की देती है अब भी सदायें
देख के अजनबी सा फिर मुझको....
यूँ हाथो से फिसलती क्यों हो..
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो

बनाए थे जो रेत के धरोंदे
शायद वो थे बचपन के धोखे
वही बन के ख्वाब रंगो का
तुम आँखो से छलकती क्यों हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो


सलोना सा रूप तेरा कुछ दिखता है ऐसा
राधा और श्याम का संग हो जैसा
नज़र से बचने के लिए लगा के दिठौना
तुम नित नये शिंगार करती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो !!

साथ हैं बस यादे कुछ बीते पलों की
कभी संग चलती कभी कहीं रुकती
यूँ बेवजह जीने की वजह बनती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम मेरे साथ यूँ चलती क्यूँ हो
ज़िंदगी तुम रोज़ बदलती क्यों हो
अपने ही अक्स को देख कर डरती क्यों हो !!

जिंदगी जीने के लिये

"जान लो ये जिन्दगी है ,
जी भर के जीने के लिए,
होसला बरकरार रखना ,
आपदा से लड़ने के लिए ,
आयेंगे लोग भड़कायेंगे ,
बहुत हुआ तो लड़वायेंगे ,
पर ये ध्यान रखना तुम ,
जीवन में ऐसे क्षण,
नित प्रतिदिन आयेंगे,
लड़वाने वाले लड़वाकर,
निकल जायेंगे हंसते हुऐ,
लड़ने वाले बैठे रह जायेंगे ,
यूं ही पश्चातापी आंसू लिये "

उठो ऐ भारत के निर्माता

हे मेरे वीर कुमार, हे नवचेतन के अग्रताहे उम्मीद सपनो के स्रजन्हार,
हे मेरे भ्रातामन में कर विचार, उठो ऐ भारत के निर्माता
कदम बढाओ, चलना तो है तुमको आताप्रशस्त राह है बढे चलो,
नवयुग तुमको पुकारता
सागर है पास तेरे, फिर भी बनता क्यूँ प्यासाहार न थककर यूँ बीच राह पर तोड़ न यूँ अपनी आशाबाहें फैलायें प्रकृति बुलाती,पूरी करले अपनी अभिलाषा
हे आर्यपुत्र,हे ब्रह्मचारी सूत्र,मन से ये विषाद हटाप्रशस्त राह है बढे चलो,
नवयुग तुमको पुकारता

कम से कम यादो से तेरी दूर ना करे

वक़्त मुझे इतना भी मजबूर ना करे,
कम से कम यादो से तेरी दूर ना करे.
शोहरते बदल देती है रिश्तो के मायने,
मुकद्दर मुझे इतना भी मशहूर ना करे.
कम से कम यादो से तेरी दूर ना करे.
दौलत ,तरक्की या फिर कामयाबीया मेरी ,
ये वक़्त की ऊंचाईया मगरूर ना करे.
कम से कम यादो से तेरी दूर ना करे.
जुदाई भी दी है उन्होने तौफे में 'शफक' ,
कैसे भला कोई इसे मंजूर ना करे.
कम से कम यादो से तेरी दूर ना करे