ye kaisa darr hai jiska koi naam nahi
ye kaisa rishta hai jiska koi anjaam nahi
Mein ek kavita likhna chahti hoon
kuch soch ke ruk jati hoon
mein usse chahna chahti hoon
kuch soch ke ruk jati hoon
Bahot socha maine iss soch ko
bahot chaha maine uske aagosh ko
Mushkil hai iss darr se dur jana
Mushkil hai iss pyar ko bhul pana
Ye darr din-pe-din badta jata hai
Pyar bhi rukta nahi bas ho sa jata hai
Kavita likhne ka ehsaas aab mujhe darata hai
Ankhen band karoon tho uska chehra hi nazar aata hai
Tuesday, June 24, 2008
Chhoti si galatfhemi kar degi juda humko,
Chhoti si galatfhemi kar degi juda humko,
Halaat na badlenge maloom na tha humko,
Rishto ki hume itni pehchan na thi pehle,
Kehne ko zakhm to apne bhi the gehre,
Ashko ke siwa lekin kuch bhi na mila humko,
Halaat na badlege maloom na tha humko,
Uthte hue kadamo mein zanjeer hi pad jaati,
Ehsaas_e_nadamat se dehleez pighaal jaati,
Ek bar mohabbat se dete jo sada humko,
Halaat na badlenge maloom na tha humko,
Chhoti si galatfhemi kar degi juda humko,
Halaat na badlenge maloom na tha humko...!!!
Halaat na badlenge maloom na tha humko,
Rishto ki hume itni pehchan na thi pehle,
Kehne ko zakhm to apne bhi the gehre,
Ashko ke siwa lekin kuch bhi na mila humko,
Halaat na badlege maloom na tha humko,
Uthte hue kadamo mein zanjeer hi pad jaati,
Ehsaas_e_nadamat se dehleez pighaal jaati,
Ek bar mohabbat se dete jo sada humko,
Halaat na badlenge maloom na tha humko,
Chhoti si galatfhemi kar degi juda humko,
Halaat na badlenge maloom na tha humko...!!!
Monday, June 23, 2008
रोशनी की जरूरत है क्या
देखिये न ये उनकी शरारत है क्या
पूछते हैं वो मुझसे मुहब्बत है क्या
आ गया तुमको चलना अंधेरे में पर
मत कहो रोशनी की जरूरत है क्या
हमको सारे वफ़ा करने वाले मिले
इतनी उम्दा हमारी भी किस्मत है क्या
सर झुकाता है जिसको ये सारा जहाँ
उस खुदा से भली कोई सूरत है क्या
दे चुका हूँ मैं सब तुमको अपना सुनो
दुनिया वालो तुम्हें अब शिकायत है क्या
तुमने सच को हमेशा कहा चीखकर
तुमको ख़ुद से ही 'अद्भुत' अदावत है क्या
पूछते हैं वो मुझसे मुहब्बत है क्या
आ गया तुमको चलना अंधेरे में पर
मत कहो रोशनी की जरूरत है क्या
हमको सारे वफ़ा करने वाले मिले
इतनी उम्दा हमारी भी किस्मत है क्या
सर झुकाता है जिसको ये सारा जहाँ
उस खुदा से भली कोई सूरत है क्या
दे चुका हूँ मैं सब तुमको अपना सुनो
दुनिया वालो तुम्हें अब शिकायत है क्या
तुमने सच को हमेशा कहा चीखकर
तुमको ख़ुद से ही 'अद्भुत' अदावत है क्या
आदम की ज़िन्दगी की रफ़्तार देखिये
आदम की ज़िन्दगी की रफ़्तार देखिये
इन्सानियत पे हावी कारोबार देखिये
रिश्तों की कब्र खोदे बैठे हैं लोग सारे
फिर किस तरह टिकेंगे परिवार देखिये
सियासत के अंधेरों में डूबी है कौम सारी
सूरज को रोशनी का तलबग़ार देखिये
भेड़ों पे करने शाषन आये हैं भेड़िये भी
वोटों की पेटियों का चमत्कार देखिये
हँस उठेगी ज़िंदगी यूँ खुद-ब-खुद ’अजय’
औरों के ग़म में रोकर एक बार देखिये
इन्सानियत पे हावी कारोबार देखिये
रिश्तों की कब्र खोदे बैठे हैं लोग सारे
फिर किस तरह टिकेंगे परिवार देखिये
सियासत के अंधेरों में डूबी है कौम सारी
सूरज को रोशनी का तलबग़ार देखिये
भेड़ों पे करने शाषन आये हैं भेड़िये भी
वोटों की पेटियों का चमत्कार देखिये
हँस उठेगी ज़िंदगी यूँ खुद-ब-खुद ’अजय’
औरों के ग़म में रोकर एक बार देखिये
Saturday, June 7, 2008
मिल रहे
ख्वाब देखो किस कदर थे तेरे मेरे मिल रहे
रौशनी बोई मगर क्यों हैं अंधेरे मिल रहे
चल पड़े थे चांदनी ले कर के झोली में सभी
राह में किस तर्ह हैं सब को लुटेरे मिल रहे
बाँट ली थी ठोकरें और रास्ते की धूप तक
अब मगर तनहाइयों में हैं बसेरे मिल रहे
रात भर ये सोचते थे सुब्ह आएगी ज़रूर
कालिमा की कैद में हैं अब सवेरे मिल रहे
देवता ने दे दिए वरदान बिन मांगे सभी
आज लेकिन देवता को दुःख घनेरे मिल रहे
देख कर तपती ज़मीं रह रह के आता है ख़याल
आसमाँ की गोद में बादल घनेरे मिल रहे
इक सुरीली तान के वश में हुए हैं क्यों सभी
बीन सी कोई बजाते हैं सपेरे मिल रहे
एक शीशे में सभी ने अक्स देखा खुश हुए
कांच के टुकड़े ज़मीं पर अब बिखेरे मिल रहे
रौशनी बोई मगर क्यों हैं अंधेरे मिल रहे
चल पड़े थे चांदनी ले कर के झोली में सभी
राह में किस तर्ह हैं सब को लुटेरे मिल रहे
बाँट ली थी ठोकरें और रास्ते की धूप तक
अब मगर तनहाइयों में हैं बसेरे मिल रहे
रात भर ये सोचते थे सुब्ह आएगी ज़रूर
कालिमा की कैद में हैं अब सवेरे मिल रहे
देवता ने दे दिए वरदान बिन मांगे सभी
आज लेकिन देवता को दुःख घनेरे मिल रहे
देख कर तपती ज़मीं रह रह के आता है ख़याल
आसमाँ की गोद में बादल घनेरे मिल रहे
इक सुरीली तान के वश में हुए हैं क्यों सभी
बीन सी कोई बजाते हैं सपेरे मिल रहे
एक शीशे में सभी ने अक्स देखा खुश हुए
कांच के टुकड़े ज़मीं पर अब बिखेरे मिल रहे
Tuesday, May 13, 2008
मीठी सी मुस्कान!
नहीं चाहिए मुझको
तेरे जीवन भर का प्यार
नहीं चाहिए मुझको
तेरे यौवन का श्रृंगार
बस॰॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए एक प्रेरणा
एक तरन्नुम
जो दे,
जीवन भर लड़ने की भूख,
गहरे दरिया में गिरकर
ऊपर उठने का ऐहसास,
आसमान में उड़कर
उड़ते रहने का आग़ाज,
आलम के सपने को
सच करने का ऐहसास।
बस॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए तेरी वो
मीठी सी मुस्कान!
मीठी सी मुस्कान!!
तेरे जीवन भर का प्यार
नहीं चाहिए मुझको
तेरे यौवन का श्रृंगार
बस॰॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए एक प्रेरणा
एक तरन्नुम
जो दे,
जीवन भर लड़ने की भूख,
गहरे दरिया में गिरकर
ऊपर उठने का ऐहसास,
आसमान में उड़कर
उड़ते रहने का आग़ाज,
आलम के सपने को
सच करने का ऐहसास।
बस॰॰॰॰॰॰॰॰
मुझे चाहिए तेरी वो
मीठी सी मुस्कान!
मीठी सी मुस्कान!!
माँ
माँ, मुझे नजर लग गयी है किसी की...
मेरी नज़र उतार दे।
अब मुझे लगने लगा है
कि बेकार नहीं थीं तेरी वो मिर्चें जो तू जला देती थी,
मुझ पर न्योंछावर करके, जब-जब बीमार हो जाता था मैं।
अब लगता है पुराने नहीं थे तेरे वो रिवाज,
जब मेरे माथे पर काली टिपकी लगाकर,
दूर रखती थी तू मुझे बुरी नजरों से।
माँ मुझे नजर लग गयी है किसी की,
दिल्ली भर की नजरें घूरती रहती हैं, सुबह से शाम तक।
सबकी हाय है शायद, घुटा-लुटा-पिटा सा बैठ जाता हूँ हर शाम,
थक हार कर, कोई काम नहीं बन रहा आजकल।
माँ! इस बार पंडित जी के पास नहीं जायेगी पूछने,
कौन सा राहू बैठा है पकडकर....?
तू बडी आस से क्यों कहती है चहककर-
" बेटा कब ले चलेगा दिल्ली 'घुमाने' "
माँ! मर जायेगी तू देखकर कि तेरा लाड़ला,
जिसके हर नखरे को तूने हमेशा संभाला है,
बार बार गिर जाता है,
जख्मी घुटने को कोई नहीं सहलाता माँ!
यहाँ कोई नहीं उठाता माँ!
आजकल तेरे हाथ की बनी चाय नहीं,
ताजे गरम गरम आँसू पी लेता हूँ,
क्योंकि इस शहर में रोने पर मनाही है।
यहाँ हर वक्त मुस्कुराना पड़ता है माँ!
तू कैसे कर पायेगी ये फरेब खुद से ही?
पहचान लेगी तू मेरी हर मुस्कान
मेरी नज़र उतार दे।
अब मुझे लगने लगा है
कि बेकार नहीं थीं तेरी वो मिर्चें जो तू जला देती थी,
मुझ पर न्योंछावर करके, जब-जब बीमार हो जाता था मैं।
अब लगता है पुराने नहीं थे तेरे वो रिवाज,
जब मेरे माथे पर काली टिपकी लगाकर,
दूर रखती थी तू मुझे बुरी नजरों से।
माँ मुझे नजर लग गयी है किसी की,
दिल्ली भर की नजरें घूरती रहती हैं, सुबह से शाम तक।
सबकी हाय है शायद, घुटा-लुटा-पिटा सा बैठ जाता हूँ हर शाम,
थक हार कर, कोई काम नहीं बन रहा आजकल।
माँ! इस बार पंडित जी के पास नहीं जायेगी पूछने,
कौन सा राहू बैठा है पकडकर....?
तू बडी आस से क्यों कहती है चहककर-
" बेटा कब ले चलेगा दिल्ली 'घुमाने' "
माँ! मर जायेगी तू देखकर कि तेरा लाड़ला,
जिसके हर नखरे को तूने हमेशा संभाला है,
बार बार गिर जाता है,
जख्मी घुटने को कोई नहीं सहलाता माँ!
यहाँ कोई नहीं उठाता माँ!
आजकल तेरे हाथ की बनी चाय नहीं,
ताजे गरम गरम आँसू पी लेता हूँ,
क्योंकि इस शहर में रोने पर मनाही है।
यहाँ हर वक्त मुस्कुराना पड़ता है माँ!
तू कैसे कर पायेगी ये फरेब खुद से ही?
पहचान लेगी तू मेरी हर मुस्कान
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