Saturday, June 7, 2008

मिल रहे

ख्वाब देखो किस कदर थे तेरे मेरे मिल रहे
रौशनी बोई मगर क्यों हैं अंधेरे मिल रहे

चल पड़े थे चांदनी ले कर के झोली में सभी
राह में किस तर्ह हैं सब को लुटेरे मिल रहे

बाँट ली थी ठोकरें और रास्ते की धूप तक
अब मगर तनहाइयों में हैं बसेरे मिल रहे

रात भर ये सोचते थे सुब्ह आएगी ज़रूर
कालिमा की कैद में हैं अब सवेरे मिल रहे

देवता ने दे दिए वरदान बिन मांगे सभी
आज लेकिन देवता को दुःख घनेरे मिल रहे

देख कर तपती ज़मीं रह रह के आता है ख़याल
आसमाँ की गोद में बादल घनेरे मिल रहे

इक सुरीली तान के वश में हुए हैं क्यों सभी
बीन सी कोई बजाते हैं सपेरे मिल रहे

एक शीशे में सभी ने अक्स देखा खुश हुए
कांच के टुकड़े ज़मीं पर अब बिखेरे मिल रहे

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