Friday, May 9, 2008

उठो ऐ भारत के निर्माता

हे मेरे वीर कुमार, हे नवचेतन के अग्रताहे उम्मीद सपनो के स्रजन्हार,
हे मेरे भ्रातामन में कर विचार, उठो ऐ भारत के निर्माता
कदम बढाओ, चलना तो है तुमको आताप्रशस्त राह है बढे चलो,
नवयुग तुमको पुकारता
सागर है पास तेरे, फिर भी बनता क्यूँ प्यासाहार न थककर यूँ बीच राह पर तोड़ न यूँ अपनी आशाबाहें फैलायें प्रकृति बुलाती,पूरी करले अपनी अभिलाषा
हे आर्यपुत्र,हे ब्रह्मचारी सूत्र,मन से ये विषाद हटाप्रशस्त राह है बढे चलो,
नवयुग तुमको पुकारता

1 comment:

manas bharadwaj said...

mitraa
achi rachna hai .....

par aapki gazal behtar hai ....

maine aapka comment pada thaa mere blog par ....

aap chahe to mujhse orkut par mil sakte hain .....

the last poem is the last desire ke naam se search kar lijiyega.....

khush rahiye and all the best for future ....